February 26, 2017
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उल्लास-चपल, उन्माद-तरल,
प्रति पल पागल--मेरा परिचय !

१.

जग ने ऊपर की आँखों से
देखा मुझको बस लाल-लाल,
कह डाला मुझको जल्दी से
द्रव माणिक या पिघला प्रवाल,
            जिसको साक़ी के अधरों ने
            चुम्बित करके स्वादिष्ट किया,
कुछ मनमौजी मजनूँ जिसको
ले-ले प्यालों में रहे ढाल;
            मेरे बारे में है फैला
            दुनिया में कितना भ्रम-संशय.
            उल्लास-चपल, उन्माद-तरल,
            प्रति पल पागल--मेरा परिचय !

२.

वह भ्रांत महा जिसने समझा
मेरा घर था जलधर अथाह,
जिसकी हिलोर में देवों ने
पहचाना मेरा लघु प्रवाह;
             अंशावतार वह था मेरा
             मेरा तो सच्चा रूप और;
विश्वास अगर मुझ पर,मानो--
मेरा दो कण वह महोत्साह,
             जो सुरासुरों ने उर में धर
             मत डाला वारिधि वृहत ह्रदय.
             उल्लास-चपल, उन्माद-तरल,
             प्रति पल पागल--मेरा परिचय !

३.

मेरी मादकता से ही तो
मानव सब सुख-दुःख सका झेल,
कर सकी मानवों की पृथ्वी
शशि-रवि सुदूर से हेल-मेल,
             मेरी मस्ती से रहे नाच
             ग्रह गण,करता है गगन गान,
वह महोन्माद मैं ही जिससे
यह सृष्टि-प्रलय का खेल-खेल,
             दु:सह चिर जीवन सह सकता
             वह चिर एकाकी लीलामय.
             उल्लास-चपल, उन्माद-तरल,
             प्रति पल पागल--मेरा परिचय !

४.

अवतरित रूप में भी तो मैं
इतनी महान,इतनी विशाल,
मेरी नन्हीं दो बूंदों ने
रंग दिया उषा का चीर लाल;
             संध्या की चर्चा क्या,वह तो
             उसके दुकूल का एक छोर,
जिसकी छाया से ही रंजित
पटल-कुटुम्ब का मृदुल गाल;
             कर नहीं मुझे सकता बन्दी
             दर-दीवारों में मदिरालय.
             उल्लास-चपल, उन्माद-तरल,
             प्रति पल पागल--मेरा परिचय !

५.

अवतीर्ण रूप में भी तो है
मेरा इतना सुरभित शरीर,
दो साँस बहा देती मेरी
जग-पतझड में मधुऋतु समीर,
             जो पिक-प्राणों में कर प्रवेश
             तनता नभ में स्वर का वितान,
लाता कमलों की महफिल में
नर्तन करने को भ्रमर-भीड़;
             मधुबाला के पग-पायल क्या
             पाएँगे मेरे मन पर जय !
             उल्लास-चपल, उन्माद-तरल,
             प्रति पल पागल--मेरा परिचय !

६.

लवलेश लास लेकर मेरा
झरना झूमा करता इसी पर,
सर हिल्लोलित होता रह-रह,
सरि बढ़ती लहरा-लहराकर,
            मेरी चंचलता की करता
            रहता है सिंधु नक़ल असफल;
अज्ञानी को यह ज्ञात नहीं,
मैं भर सकती कितने सागर.
            कर पाएँगे प्यासे मेरा
            कितना इन प्यालो में संचय.
            उल्लास-चपल, उन्माद-तरल,
            प्रति पल पागल--मेरा परिचय !

७.

है आज प्रवाहित में ऐसे,
जैसे कवि के ह्रदयोद्गार;
तुम रोक नहीं सकते मुझको,
कर नहीं सकोगे मुझे पार;
            यह अपनी कागज़ की नावें
            तट पर बाँधो आगे न बढ़ो,
ये तुम्हें डूबा देंगी गलकर
हे श्वेत-केश-धर कर्णधार;
            बह सकता जो मेरी गति से
            पा सकता वह मेरा आश्रय .
            उल्लास-चपल, उन्माद-तरल,
            प्रति पल पागल--मेरा परिचय !

८.

उद्दाम तरंगों से अपनी
मस्जिद,गिरजाघर ,देवालय
मैं तोड़ गिरा दूँगी पल में--
मानव के बंदीगृह निश्चय.
             जो कूल-किनारे तट करते
             संकुचित मनुज के जीवन को,
मैं काट सबों को डालूँगी.
किसका डर मुझको?मैं निर्भय.
             मैं ढहा-बहा दूँगी क्षण में
             पाखंडों के गुरू गढ़ दुर्जय.
             उल्लास-चपल, उन्माद-तरल,
             प्रति पल पागल--मेरा परिचय !

९.

फिर मैं नभ गुम्बद के नीचे
नव-निर्मल द्वीप बनाऊँगी,
जिस पर हिलमिलकर बसने को
संपूर्ण जगत् को लाऊँगी;
             उन्मुक्त वायुमंडल में अब
             आदर्श बनेगी मधुशाला;
प्रिय प्रकृति-परी के हाथों से
ऐसा मधुपान कराऊँगी,
             चिर जरा-जीर्ण मानव जीवन से
             पाएगा नूतन यौवन वय.
             उल्लास-चपल, उन्माद-तरल,
             प्रति पल पागल--मेरा परिचय !
१०.

रे वक्र भ्रुओं वाले योगी !
दिखला मत मुझको वह मरुथल,
जिसमे जाएगी खो जाएगी
मेरी द्रुत गति,मेरी ध्वनि कल.
             है ठीक अगर तेरा कहना,
             मैं और चलूँगी इठलाकर;
संदेहों में क्यूँ व्यर्थ पडूँ?
मेरा तो विश्वास अटल--
             मैं जिस जड़ मरु में पहुंचूंगी
             कर दूँगी उसको जीवन मय.
             उल्लास-चपल, उन्माद-तरल,
             प्रति पल पागल--मेरा परिचय !

११.

लघुतम गुरुतम से संयोजित --
यह जान मुझे जीवन प्यारा
परमाणु कँपा जब करता है
हिल उठता नभ मंडल सारा !
             यदि एक वस्तु भी सदा रही,
             तो सदा रहेगी वस्तु सभी,
त्रैलोक्य बिना जलहीन हुए
सकती न सूख कोई धारा;
             सब सृष्टि नष्ट हो जाएगी,
             हो जाएगा जब मेरा क्षय.
             उल्लास-चपल, उन्माद-तरल,
             प्रति पल पागल--मेरा परिचय !

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